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21.सिविल सर्विस ,मंत्री और जन-प्रतिनिधि

21. सिविल सर्विस , मंत्री और जन-प्रतिनिधि        सिविल सेवा , और चुने गए जन-प्रतिनिधियों के बीच के आपसी सम्बन्धों का भारत की शासन-प्रणाली में  बहुत महत्त्व है।श्री शिबू-सोरेन के प्रधानमंत्री को मेरे स्थानांतरण के संदर्भ में लिखे पत्र और मेरे उसके प्रत्युत्तर से इस मौलिक विषय पर कई सवाल उठते हैं। यही सवाल कैबिनेट सेक्रेटरी , सांसद , प्रशासनिक अधिकारियों तथा भारत- सरकार के सरकारी  उपक्रमों के अध्यक्ष-सह-प्रबंधक निदेशकों के साथ हुई मेरी अनेक संवाद-शृंखलाओं में भी सामने आए।ये प्रश्न केंद्र या केवल कोल मंत्रालय से ही संबंधित नहीं हैं | ऐसे ही कई मुद्दे समय-समय पर , जब मैं राज्य-सरकार में काम कर रहा था , तब भी उठते रहे हैं , जिसका मैंने इस किताब के भाग- 1 में जिक्र किया हैं |  विगत कई वर्षों से प्रशासनिक अधिकारियों तथा चुने गए प्रतिनिधियों के बीच संबंध बहुत बिगड़  गए हैं या तो पूरी तरह से  विरोधात्मक हैं या फिर मिलीभगत के । जबकि एक अच्छा प्रशासन चलाने के लिए ये संबंध सौहार्द्रपूर्ण तथा सहयोगी होने चाहिए थे । यह भारत की शासन-प्रणाली के कमज...

20.सुप्रीम कोर्ट,सीबीआई और कोलगेट

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20 . सुप्रीम कोर्ट , सीबीआई और कोलगेट जैसे ही कोल ब्लॉक आवंटन पर सीएजी की रिपोर्ट प्रकाशित हुई , तो देश में मानो भूचाल-सा आ गया। इतना बड़ा घोटाला ? लोगों की कल्पना से भी परे था। लोग टेलीविजन की चैनलों पर यह खबर सुनकर दाँतों तले अंगुली दबाने लगे। सही में , सबसे बड़ा घोटाला-कोलगेट ? 1.86 लाख करोड़ रुपये का घोटाला। जनहित याचिकाएँ दर्ज की गई। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को जाँच-पड़ताल करने के निर्देश दिए। सन 1993 में जब  कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट में प्राइवेट सेक्टर को कैप्टिव माइनिंग के लिए कोल-ब्लॉकों को देने के लिए संशोधन किया गया था तब से लेकर आज तक 1993 से 2003 तक किए गए  आवंटन तत्कालीन कांग्रेस सरकार की नीतियों जिनका बाद में एनडीए सरकार ने भी  अनुकरण किया , के अनुसार किया गया था । मेरे हिसाब से सन् 1993 से सन् 2003 के मध्य आवंटित कोल ब्लॉकों की जाँच करने की कोई जरूरत नहीँ थी। क्योंकि सीएजी ने इस अवधि के आवंटनों पर न तो कोई विपरीत प्रतिक्रिया दर्शाई थी और न ही किसी प्रकार की कोई शिकायत की थी। ऐसे भी दो दशक से ज्यादा का समय बीत चुका था। उस समय लिए गए निर्णय की वर्तमान समय...